सभ्यता का संक्रमण काल

 समाज और सामाजिकता अपने संक्रमण काल से गुजर रहा है।

             पुरानी पीढ़ी पुरातन परम्पराओं और आडम्बरों से बाहर नहीं आना चाहता और नई पीढ़ी पुरानी,क्लिष्ट और क्षतविक्षत परंपराओं का बोझ उठाने को तैयार नहीं है। यद्यपि  नए पीढ़ी के कुछ लोग पुराने परंपराओं के विकृत स्वरूप को ही सभ्यता मान बैठे हैं,  उसको ढोने की पुरजोर कोशिश करते हैं, हर बार घायल हो जाते हैं पर हार नहीं मानना चाहते। 

            जीवन का ध्येय सभ्यताओं के ढ़ोना नहीं अपितु सभ्यता का निर्माण करना है। ऐसी सभ्यता जो मानवता में शांति और सुख का प्रवाह कर सके, साथ ही नैतिक दायित्वों का हनन भी न हो। विकृत परम्पराएं और जर्जर पड़ चुकी सभ्यता अगर मनुष्य के जीवन के सुख को छीन रही है तो वैसी सभ्यताओं का स्वरूप बदलने की कोशिश करना ही उचित है। जीवन मे जीवन एक बार ही प्राप्य है, उस एक जीवन को भी अगर आपको ' लोग क्या कहेंगे' की चिंता में गुजार कर दुःख, असंतुष्टि और अशांतिपूर्ण तरीके से जीना है तो लोकमर्यादा का पालन करने को ही जीवन मानने की बड़ी भूल हो रही है। जहाँ आपके हर कर्म लोकमर्यादा के इर्दगिर्द मंडराता रह जाता है तथा आपके अपने जीवन और उसके सुख शांति का मोल शून्य हो जाता है।  पर संक्रमण काल है, इसमें पीढियां इसी लोकमर्यादा का पूर्णतया पालन कर पाने में भी असर्मथता दर्शाती  है  पर इसी लोकमर्यादा को बोझ समझते हुए भी पालन करने का असफल प्रयास करती रहती है और दुख प्राप्त करती है। 

           जीवन का ध्येय धन ,मान , मकान या साधन हासिल करना कभी नही  था, होना भी नहीं चाहिए। पर लोग यही मानते रहे और भूल करते रहे और अपनी आगे की पीढ़ियों में यही समझ परंपरा के रूप में देते आए। जीवन का ध्येय तो सुख-शांति लाना है। जीवन में सुख और शांति जैसे भी मिल पाए, उसे अपना लेना चाहिए। किसी की कोई क्षति न हो और आप सुखी हो गए, शांति प्राप्त कर लें तो आप सही सभ्यता में जी रहे हैं अन्यथा विकृत परम्पराओं को सभ्यता और सामाजिक मर्यादा का नाम दे कर अपने जीवन के ध्येय से ही दूर होते जा रहे। यही होता आ रहा है, होता जाएगा। समाज को जो दर्पण दिखाने की कोशिश करेंगे उन्हें दोषी करार दिया जाएगा। समाज सुधारक आप भी हो सकते हैं पर आपको मानसिक रूप से तैयार होना होगा कि आप दोषी करार दिए जाएं। पर आप लोकमर्यादा के नाम पर एक आडम्बर के बोझ को उतारने नहीं चाहते क्योंकि  ऊँट के कूबड़ की तरह जन्मजात वो बोझ आपके पीठ पर आपके पूर्वजों के द्वारा चिपका दिया गया है और उस कूबड़ को उतारने की हिम्मत आप नहीं कर पाते क्योंकि आपको लगता है कि आप समाज रूपी इस मरुस्थल में प्यासे मारे जायेंगे। आप इस कूबड़ को उतार फेंकिए और देखिए आप जिसे मृगतृष्णा समझ रहे वो एक मीठे पानी की झील ही है। 


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