सभ्यता का संक्रमण काल
समाज और सामाजिकता अपने संक्रमण काल से गुजर रहा है। पुरानी पीढ़ी पुरातन परम्पराओं और आडम्बरों से बाहर नहीं आना चाहता और नई पीढ़ी पुरानी,क्लिष्ट और क्षतविक्षत परंपराओं का बोझ उठाने को तैयार नहीं है। यद्यपि नए पीढ़ी के कुछ लोग पुराने परंपराओं के विकृत स्वरूप को ही सभ्यता मान बैठे हैं, उसको ढोने की पुरजोर कोशिश करते हैं, हर बार घायल हो जाते हैं पर हार नहीं मानना चाहते। जीवन का ध्येय सभ्यताओं के ढ़ोना नहीं अपितु सभ्यता का निर्माण करना है। ऐसी सभ्यता जो मानवता में शांति और सुख का प्रवाह कर सके, साथ ही नैतिक दायित्वों का हनन भी न हो। विकृत परम्पराएं और जर्जर पड़ चुकी सभ्यता अगर मनुष्य के जीवन के सुख को छीन रही है तो वैसी सभ्यताओं का स्वरूप बदलने की कोशिश करना ही उचित है। जीवन मे जीवन एक बार ही प्राप्य है, उस एक जीवन को भी अगर आपको ' लोग क्या कहेंगे' की चिंता में गुजार कर दुःख, असंतुष्टि और अशांतिपूर्ण तरीके से जीना है तो लोकमर्यादा का पालन करने को ही जीवन मानने की बड़ी भूल हो रही है। जहा...